0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [परमेश्वर] (अस्य) इस (सर्वजन्मनः) विविध जन्मवाले और (सर्वस्य) सब (चेष्टतः) चेष्टा करनेवाले [कार्यरूप जगत्] का (ईशे) ईश्वर है, [वह] (अतन्द्रः) आलस रहित, (धीरः) धीर [बुद्धिमान्] (प्राणः) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] (ब्रह्मणा) वेदज्ञान द्वारा (मा अनु) मेरे साथ-साथ (तिष्ठतु) ठहरा रहे ॥२४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सर्वशक्तिमान्, सर्वनियन्ता परमेश्वर की महिमा जानकर निरालसी, धीर, वीर होकर पुरुषार्थ करे ॥२४॥इस मन्त्र का पूर्वार्ध कुछ भेद से ऊपर मन्त्र २३ में आया है ॥
टिप्पणी: २४−पूर्वार्धर्चो व्याख्यातः, म० २३। विश्वशब्दस्य स्थाने सर्वशब्दो विशेषः। (अतन्द्रः) निरलसः। (ब्रह्मणा) वेदज्ञानेन (धीरः) धीमान्। बुद्धिमान् (प्राणः) जीवनदाता परमेश्वरः (मा) माम् (अनु) अनुलक्ष्य (तिष्ठतु) वर्तताम् ॥
