अ॒ष्टाच॑क्रं वर्तत॒ एक॑नेमि स॒हस्रा॑क्षरं॒ प्र पु॒रो नि प॒श्चा। अ॒र्धेन॒ विश्वं॒ भुव॑नं ज॒जान॒ यद॑स्या॒र्धं क॑त॒मः स के॒तुः ॥
पद पाठ
अष्टाऽचक्रम् । वर्तते । एकऽनेमि । सहस्रऽअक्षरम् । प्र । पुर: । नि । पश्चा । अर्धेन । विश्वम् । भुवनम् । जजान । यत् । अस्य । अर्धम् । कतम: । स: । केतु: ॥६.२२॥
अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:22
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अष्टाचक्रम्) आठ [दिशाओं] में चक्रवाला, (एकनेमि) एक नेमि [नियमवाला] और (सहस्राक्षरम्) सहस्र प्रकार से व्याप्तिवाला [ब्रह्म] (प्र) भलीभाँति (पुरः) आगे और (नि) निश्चय करके (पश्चा) पीछे (वर्तते) वर्तमान है। उसने (अर्धेन) आधे खण्ड से (विश्वम्) सब (भुवनम्) अस्तित्व [जगत्] को (जजान) उत्पन्न किया, और (यत्) जो (अस्य) इस [ब्रह्म] का (अर्धम्) [दूसरा कारणरूप] आधा है, (सः) वह (कतमः) कौन सा (केतुः) चिह्न है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - वह परब्रह्म अपने अटूट नियम से सब जगत् में व्यापकर सबसे पहिले और पीछे निरन्तर वर्तमान है, उसी की सामर्थ्य से यह सब जगत् उत्पन्न हुआ है और उसी की शक्ति में अनन्त कारणरूप पदार्थ वर्तमान है ॥२२॥यह मन्त्र कुछ भेद से आ चुका है, देखो-अथर्व० १०।८।७। तथा १३ ॥
टिप्पणी: २२−(अष्टाचक्रम्) अष्टसु दिक्षु चक्रं यस्य तद् ब्रह्म। अन्यद्व्याख्यातम्-अथर्व० १०।८।७ तथा १३ ॥
