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य॒दा प्रा॒णो अ॒भ्यव॑र्षीद्व॒र्षेण॑ पृथि॒वीं म॒हीम्। ओष॑धयः॒ प्र जा॑य॒न्तेऽथो॒ याः काश्च॑ वी॒रुधः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यदा । प्राण: । अभिऽअवर्षीत् । वर्षेण । पृथिवीम् । महीम् । ओषधय: । प्र । जायन्ते । अथो इति । या: । का: । च । वीरुध: ॥६.१७॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:17


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

प्राण की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यदा) जब (प्राणः) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] ने (वर्षेण) वर्षा द्वारा (महीम्) विशाल (पृथिवीम्) पृथिवी को (अभ्यवर्षीत्) सींच दिया, (अथो) तब ही (ओषधयः) अन्न आदि पदार्थ (च) और (याः काः) जो कोई (वीरुधः) जड़ी-बूटी हैं, वे भी (प्र जायन्ते) बहुत उत्पन्न होती हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर के नियम से वृष्टि होने पर ग्राम्य और आरण्य पदार्थ उत्पन्न होकर संसार का उपकार करते हैं ॥१७॥इस मन्त्र का पूर्वार्ध ऊपर मन्त्र ५ में आया है ॥
टिप्पणी: १७−पूर्वार्धर्चो व्याख्यातः-म० ५ (ओषधयः) अन्नादिपदार्थाः (प्र जायन्ते) (अथो) अनन्तरमेव (याः) (काः) (च) (वीरुधः) अ० १।३२।१। विरोहणशीला लतादयः ॥