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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणापानौ) प्राण और अपान [श्वास और प्रश्वास] (व्रीहियवौ) चावल और जौ [के समान पुष्टिकारक] हैं, (प्राणः) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] (अनड्वान्) जीवन का चलानेवाला (उच्यते) कहा जाता है। (यवे) जौ में (ह) भी (प्राणः) प्राण [श्वासवायु] (आहितः) रक्खा हुआ है, (अपानः) अपान [प्रश्वास वायु] (व्रीहिः) चावल (उच्यते) कहा जाता है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने प्राणियों के भीतर श्वास-प्रश्वास को चावल जौ अन्न आदि के समान पुष्टिकारक बनाया है ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(प्राणापानौ) प्राणस्य वृत्तिविशेषौ। श्वासप्रश्वासौ (व्रीहियवौ) अ० ६।१४०।२। अन्नविशेषौ (अनड्वान्) अ० ४।११।१। अनः+वह प्रापणे-क्विप्। अनसो जीवनस्य वाहकः संचालकः (प्राणः) (उच्यते) (यवे) (ह) एव (आहितः) स्थापितः (अपानः) प्रश्वासः (व्रीहिः) (उच्यते) ॥
