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प्रा॒णो मृ॒त्युः प्रा॒णस्त॒क्मा प्रा॒णं दे॒वा उपा॑सते। प्रा॒णो ह॑ सत्यवा॒दिन॑मुत्त॒मे लो॒क आ द॑धत् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्राण: । मृत्यु: । प्राण: । तक्मा । प्राणम् । देवा: । उप । आसते । प्राण: । ह । सत्यऽवादिनम् । उत्ऽतमे । लोके । आ । दधत् ॥६.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

प्राण की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणः) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] (मृत्युः) मृत्यु और (प्राणः) प्राण (तक्मा) जीवन को कष्ट देनेवाला [ज्वर आदि रोग] है, (प्राणम्) प्राण की (देवाः) विद्वान् लोग (उप आसते) उपासना करते हैं। (प्राणः) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] (ह) ही (सत्यवादिनम्) सत्यवादी को (उत्तमे लोके) उत्तम लोक पर (आ दधत्) स्थापित कर सकता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरीय नियम से विरुद्ध चलने पर मनुष्य मृत्यु और रोग को पाते हैं। विद्वान् लोग इसलिये परमात्मा की उपासना करते और जितेन्द्रिय होकर अपने श्वास-प्रश्वास को वश में करते हैं कि वे सत्यवादी होकर श्रेष्ठ पद पावें ॥११॥
टिप्पणी: ११−(प्राणः) जीवनप्रदः परमेश्वरः (मृत्युः) मरणस्य कर्त्ता (तक्मा) अ० १।२५।१। कृच्छ्रजीवनकरो ज्वरादिरोगः (देवाः) विद्वांसः (उपासते) सेवन्ते (ह) एव (सत्यवादिनम्) यथार्थवक्तारम् (उत्तमे) उत्कृष्टे (लोके) दर्शनीये स्थाने (आ दधत्) लेटि रूपम्। स्थापयेत् ॥