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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्राण की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणाय) प्राण [जीवनदाता परमेश्वर] को (नमः) नमस्कार है, (यस्य) जिसके (वशे) वश में (सर्वम्) सब (इदम्) यह [जगत्] है। (भूतः) सदा वर्तमान (यः) जो (सर्वस्य) सबका (ईश्वरः) ईश्वर है और (यस्मिन्) जिसके भीतर (सर्वम्) सब (प्रतिष्ठितम्) अटल ठहरा है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सर्वपोषक, सर्वशक्तिमान् प्राणनाम जगदीश्वर की उपासना करके मनुष्य अपने प्राणों के बल को सदा बढ़ाते रहें ॥१॥परमेश्वर का प्राण नाम है, देखो प्रश्नोपनिषद् खण्ड २ श्लोक ६ ॥ अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्। ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥१॥अरों के समान रथ की नाभि में, प्राण के बीच सब जड़ा हुआ है−ऋचाएँ [स्तुतिविद्याएँ] यजुर्मन्त्र [ईश्वरपूजा के मन्त्र] और साममन्त्र [मोक्षविद्याएँ-अर्थात् कर्म, उपासना और ज्ञान], यज्ञ [श्रेष्ठ व्यवहार] राज्य और धन ॥और देखो मनु अध्याय १२ श्लोक १२३। एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रमेकेऽपरे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥१॥इस [परमेश्वर] को कोई अग्नि, कोई मनु और प्रजापति, कोई इन्द्र, कोई प्राण और कोई नित्य ब्रह्म कहते हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(प्राणाय) प्र+अन प्राणने-घञ्। प्राणित्यनेनेति प्राणस्तस्मै जीवनदात्रे परमेश्वराय (नमः) सत्कारः (यस्य) (सर्वम्) समस्तम् (इदम्) दृश्यमानं जगत् (वशे) प्रभुत्वे (यः) (भूतः) सर्वदा लब्धसत्ताकः (सर्वस्य) (ईश्वरः) अश्नोतेराशुकर्मणि वरट् च। उ० ५।५७। अशू व्याप्तौ-वरट्, उपधाया ईत्वम्। शीघ्रकारी। यद्वा, स्थेशभासपिसकसो वरच्। पा० ३।२।१७५। ईश ऐश्वर्ये-वरच्। ईशिता स्वामी (यस्मिन्) (सर्वम्) (प्रतिष्ठितम्) दृढं स्थितम् ॥
