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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह (सर्वज्यानिम्) सब हानि से (च) ही (न) नहीं (जीयते) हीन होता है, [किन्तु] (एनम्) इस [मनुष्य] को (जरसः) जरा [स्तुति का बुढ़ापा पाने] से (पुरा) पहिले (प्राणः) [जीवनव्यापार] (जहाति) छोड़ देता है ॥५६॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर का विरोधी मनुष्य निर्बल, अपकीर्तिवाला, अल्पजीवी और दुर्बलेन्द्रिय होता है ॥५६॥
टिप्पणी: ५६−(न) निषेधे (च) अवधारणे (सर्वज्यानिम्) म० ५५। सर्वहान्या (जीयते) हीयते (पुरा) पुरस्तात् (एनम्) पुरुषम् (जरसः) अ० १।३०।२। जॄ स्तुतौ, यद्वा जॄष् वयोहानौ-असुन्। जरायाः स्तुतेर्वयोहानेर्वा सकाशात् (प्राणः) श्वासप्रश्वासव्यापारः (जहाति) त्यजति ॥
