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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (च) यदि वह (प्राणम्) [अपने] प्राण को (न) नहीं (रुणद्धि) रोकता है, वह (सर्वज्यानिम्) सब हानि से (जीयते) निर्बल हो जाता है ॥५५॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमेश्वर के सामर्थ्य को देखते हुए भी जितेन्द्रिय नहीं होता, वह मनुष्यपन से गिरकर बलहीन हो जाता है ॥५५॥
टिप्पणी: ५५−(न) निषेधे (च) यदि (प्राणम्) श्वासप्रश्वासव्यापारम् (रुणद्धि) वशं करोति (सर्वज्यानिम्) ज्या वयोहानौ-क्तिन्, सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। तृतीयास्थाने द्वितीया। सर्वज्यान्या। सर्वहान्या (जीयते) ज्या वयोहानौ कर्मणि-लट्। हीयते ॥
