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तेषां॑ प्र॒ज्ञाना॑य य॒ज्ञम॑सृजत ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तेषाम् । प्रऽज्ञानाय । यज्ञम् । असृजत ॥५.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:53


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - उस [परमेश्वर] ने (तेषाम्) उन [तेंतीस देवताओं के सामर्थ्य] के (प्रज्ञानाय) प्रकृष्ट ज्ञान के लिये (यज्ञम्) यज्ञ [परस्पर जगत् संसार] को (असृजत) सृजा ॥५३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने उन वसु आदि देवताओं से यह संसार इसलिये रचा है कि मनुष्य परमात्मा के संगठन सामर्थ्य को जानकर परस्पर बल बढ़ावें ॥५३॥
टिप्पणी: ५३−(तेषाम्) त्रयस्त्रिंशतो लोकानाम् (प्रज्ञानाय) प्रकृष्टबोधाय (यज्ञम्) परस्परसंगतसंसारम् (असृजत) सृष्टवान् ॥