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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एतस्मात्) इस (वै) ही (ओदनात्) [अपने] ओदन [सुख बरसानेवाले अन्नरूप सामर्थ्य] से (त्रयस्त्रिंशतम्) तेंतीस (लोकान्) लोकों [दर्शनीय देवताओं] को (प्रजापतिः) प्रजापति [सृष्टिपालक परमेश्वर] ने (निः अमिमीत) निर्माण किया है ॥५२॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर ने अपने सर्वपोषक सामर्थ्य से जगदुपकारक तेंतीस देवताओं को रचा है। वे तेंतीस देवता ये हैं−८ वसु, ११ रुद्र, १२ महीने, १ बिजुली, १ यज्ञ−देखो अथर्व० ६।१३९।१ ॥५२॥
टिप्पणी: ५२−(एतस्मात्) (वै) एव (ओदनात्) स्वस्मात् सुखवर्षकात् सामर्थ्यात् (त्रयस्त्रिंशतम्) वसुरुद्रादीन्-अ० ६।१३९।१। (लोकान्) दर्शनीयान् देवान् (निरमिमीत) अ० ५।१२।११। निर्मितवान् (प्रजापतिः) सृष्टिपालकः परमेश्वरः ॥
