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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [मनुष्य] (ब्रध्नलोकः) महान् [सबके नियामक परमेश्वर] में निवासवाला (भवति) होता है और [उसी] (ब्रध्नस्य) महान् [सर्वनियामक परमेश्वर] के (विष्टपि) सहारे में (श्रयते) आश्रय लेता है, (यः) जो [मनुष्य] (एवम्) ऐसा (वेद) जानता है ॥५१॥
भावार्थभाषाः - जो ज्ञानी पुरुष परमात्मा का आश्रय लेता है, वह पुरुषार्थी आनन्द पाता है ॥५१॥
टिप्पणी: ५१−(ब्रध्नलोकः) ब्रध्ने सर्वनियामके परमेश्वरे लोको निवासो यस्य सः (भवति) (ब्रध्नस्य) म० ५०। महतः सर्वनियामकस्य परमेश्वरस्य (विष्टपि) म० ५०। आश्रये (श्रयते) तिष्ठति (यः) मनुष्यः (एवम्) उक्तप्रकारेण (वेद) जानाति परमात्मानम् ॥
