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दितिः॒ शूर्प॒मदि॑तिः शूर्पग्रा॒ही वातोऽपा॑विनक् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दिति: । शूर्पम् । अदिति: । शूर्पऽग्राही । वात: । अप । अविनक् ॥३.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (दितिः) [परमेश्वर की] खण्डन शक्ति (शूर्पम्) सूप [समान] है, (अदितिः) [उसकी] अखण्डन शक्ति ने (शूर्पग्राही) सूप पकड़नेवाले [के समान] (वातः-वातेन) पवन से (अप अविनक्) [शुद्ध और अशुद्ध पदार्थ को] अलग-अलग किया है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे लोग सूप से वायु द्वारा अशुद्ध वस्तु को निकालकर शुद्ध वस्तु को ले लेते हैं, वैसे ही परमेश्वर अपने सामर्थ्य से प्रकृति द्वारा परमाणुओं का संयोग-वियोग करके जगत् को रचता है और वैसे ही विवेकी पुरुष विद्या द्वारा अवगुण छोड़कर गुण ग्रहण करता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(दितिः) दो अवखण्डने-क्तिन्। खण्डनशक्तिः परमेश्वरस्य (शूर्पम्) सुशॄभ्यां निच्च। उ० ३।२६। शॄ हिंसायाम्-प प्रत्ययः। यद्वा, शूर्प माने-घञ्। धान्यस्फोटकपात्रम् (अदितिः) अ० २।२९।४। नञ्+दो अवखण्डने-क्तिन्। अखण्डनशक्तिः (शूर्पग्राही) ग्रह उपादाने-णिनि। शूर्पग्राहकः पुरुषः (वातः) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। विभक्तेः सु। वातेन, वायुना (अप अविनक्) विचिर् पृथग्भावे-लङ्। पृथक् पृथक् कृतवान् शुद्धाशुद्धवस्तूनि ॥