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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मवादिनः) ब्रह्मवादी [ईश्वर वा वेद को विचारनेवाले] (वदन्ति) कहते हैं−“[हे मनुष्य ! क्या] (पराञ्चम्) दूरवर्ती (ओदनम्) ओदन [सुख बरसानेवाले अन्नरूप परमेश्वर] को (प्र आशीः ३) तूने खाया है, [अथवा] (प्रत्यञ्चा३म् इति) प्रत्यक्षवर्ती को ? ॥२६॥
भावार्थभाषाः - प्रश्न है कि क्या परमेश्वर किसी दूर वा प्रत्यक्ष स्थान विशेष में मिलता है ? इसका उत्तर आगे मन्त्र २८ तथा २९ में है ॥२६॥
टिप्पणी: २६−(ब्रह्मवादिनः) ब्रह्मणः परमेश्वरस्य वेदस्य वा विचारका महर्षयः (वदन्ति) भाषन्ते (पराञ्चम्) परा+अञ्चु गतिपूजनयोः-क्विन्। दूरे गच्छन्तम् (ओदनम्) सुखवर्षकमन्नरूपं परमेश्वरम् (प्र) प्रकर्षेण (आशीः३) अश भोजने-लुङ्। विचार्यमाणानाम्। पा० ८।२।९७। इति टेः प्लुतः। भक्षितवानसि (प्रत्यञ्चा३म्) प्रति+अञ्चु गतिपूजनयोः क्विन्, पूर्ववत् प्लुतः। प्रत्यञ्चनम् प्रत्यक्षवर्तिनम् (इति) वाक्यसमाप्तौ ॥
