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बृ॒हदा॒यव॑नं रथन्त॒रं दर्विः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

बृहत् । आऽयवनम् । रथम्ऽतरम् । दर्वि: ॥३.१६॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:16


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहत्) बृहत् [बड़ा आकाश] (आयवनम्) [उस परमेश्वर का] सब ओर से मिलाने का चमचा, और (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय पदार्थों द्वारा पार लगानेवाला जगत्] (दर्विः) [उसकी] डोबी [परोसने की करछी है] ॥१६॥
भावार्थभाषाः - यह सब आकाश और सब जगत् परमेश्वर के लिये ऐसे छोटे पदार्थ हैं, जैसे गृहस्थ के चमचे आदि पात्र होते हैं ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(बृहत्) प्रवृद्धमाकाशम् (आयवनम्) आङ्+यु मिश्रणामिश्रणयोः-ल्युट्। समन्ताद् मिश्रणसाधनं चमसः (रथन्तरम्) अ० ८।१०(२)।६। रमु क्रीडायाम्−क्थन्+तॄ प्लवनतरणयोः-खच् मुम् च। रथै रमणीयैः पदार्थैस्तरति येन तज् जगत् (दर्विः) अ० ४।१४।७। दॄ विदारणे-विन्। पाकोद्धारणसाधनम् ॥