पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इयम् एव) यही (पृथिवी) फैली हुई भूमि (राध्यमानस्य) पकते हुए (ओदनस्य) ओदन [सुख बरसानेवाले अन्नरूप परमेश्वर] की (कुम्भी) बटलोही और (द्यौः) प्रकाशमान सूर्य (अपिधानम्) ढकनी [समान] (भवति) है ॥११॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर इतना बड़ा है कि वह इन पृथिवी सूर्य आदि लोकों में निरन्तर व्यापक है ॥११॥
टिप्पणी: ११−(इयम्) दृश्यमाना (एव) अवश्यम् (पृथिवी) प्रथिता भूमिः (कुम्भी) पाकस्थाली (भवति) वर्तते (राध्यमानस्य) पच्यमानस्य (ओदनस्य) सुखवर्षकस्यान्नरूपस्य परमेश्वरस्य (द्यौः) प्रकाशमानः सूर्यः (अपिधानम्) कुम्भीमुखच्छादनपात्रम् ॥
