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आ॒न्त्राणि॑ ज॒त्रवो॒ गुदा॑ वर॒त्राः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आन्त्राणि । जत्रव: । गुदा: । वरत्रा: ॥३.१०॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:10


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (जत्रवः) जोते [बैलों की ग्रावा के रस्से] (आन्त्राणि) [उसकी] आँतें और (वरत्राः) वरत्र [बरन, हल के बैलों के बड़े रस्से] (गुदाः) [उसकी] गुदाएँ [उदर की नाड़ी विशेष] हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - बैल आदि का बाँधना और उपयोग ईश्वर से सिखाया गया है ॥१०॥
टिप्पणी: १०−(आन्त्राणि) अ० १।३।६। उदरनाडिविशेषाः (जत्रवः) जत्र्वादयश्च। उ० ४।१०२। जनी प्रादुर्भावे-रु नस्य तः। स्कन्धबन्धनानि (गुदाः) अ० २।३३।४। गुद खेलने-क, टाप्। अशितपीतान्नरससंचारणार्था उदरनाडिविशेषाः (वरत्राः) अ० ३।१७।६। वृञ् संवरणे-अत्रन्, टाप्। हले वृषभबन्धनबृहद्रज्जवः ॥