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स नो॑ भ॒वः परि॑ वृणक्तु वि॒श्वत॒ आप॑ इवा॒ग्निः परि॑ वृणक्तु नो भ॒वः। मा नो॒ऽभि मां॑स्त॒ नमो॑ अस्त्वस्मै ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स: । न: । भव: । परि । वृणक्तु । विश्वत: । आप:ऽइव । अग्नि: । परि । वृणक्तु । न: । भव: । मा । न: । अभि । मांस्त । नम: । अस्तु । अस्मै ॥२.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह (भवः) भव [सुख उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर] (नः) हमें [दुष्ट कर्मों से] (विश्वतः) सब ओर (परि वृणक्तु) बरजता [रोकता] रहे, (इव) जैसे (आपः) जल और (अग्निः) अग्नि [एक दूसरे को रोकते हैं, वैसे ही] (भवः), भव [सुख उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर] (नः) हमें (परि वृणक्तु) बरजता रहे। (नः) हमें (मा अभि मांस्त) वह न सतावे, (अस्मै) इस [परमेश्वर] को (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे ॥८॥
भावार्थभाषाः - जैसे जल अग्नि से और अग्नि जल से पृथक् होते हैं, वैसे ही हम दुष्ट कर्मों से पृथक् रहकर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करके सुरक्षित रहें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(सः) प्रसिद्धः (नः) अस्मान् (भवः) म० ३। सुखोत्पादकः (परि वृणक्तु) परितो वर्जयतु, दुष्टकर्मस्य इति शेषः (विश्वतः) सर्वतः (आपः) जलानि (इव) यथा (अग्निः) (नः) अस्मान् (मा अभि मांस्त) अभिपूर्वो मन्यतिर्हिंसने-माङि लुङि रूपम्। न हिनस्तु (नमः) नमस्कारः (अस्तु) (अस्मै) भवाय। अन्यद् गतम् ॥