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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भव) हे भव ! [सुख उत्पन्न करनेवाले] (रुद्र) हे रुद्र ! [दुःखनाशक] (अमर्त्य) हे अमर ! [जगदीश्वर] (सहस्राक्षाय) सहस्रों कर्मों में दृष्टिवाले (ते) तुझको (क्रन्दाय) [अपना] रोदन मिटाने के लिये (ते) तुझे (प्राणाय) [अपना] जीवन बढ़ाने के लिये (च) और (ते) तुझे (याः) जो (रोपयः) [हमारी] पीड़ाएँ हैं [उन्हें हटाने के लिये] (नमः कृण्मः) हम नमस्कार करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से सब ओर दृष्टि करके और भीतरी क्लेश मिटाकर अपना जीवन सुफल करे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(क्रन्दाय) क्रदि आह्वाने रोदने च-घञ्। क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० ३।२।१४। क्रन्दं रोदनं नाशयितुम् (ते) तुभ्यम् (प्राणाय) प्राणं जीवनं वर्धयितुम् (याः) (च) (ते) तुभ्यम् (भव) भू-अप्। हे सुखोत्पादक (रोपयः) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। रुप विमोहने-इन्। विमोहिकाः पीडाः (नमः) सत्कारः (ते) तुभ्यम् (रुद्र) अ० २।२७।६। रु वधे-क्विप्, तुक्+रु वधे-ड। हे दुःखनाशक। यद्वा, रु गतौ-क्विप्+रा दाने-क। हे ज्ञानदातः (कृण्मः) कुर्मः (सहस्राक्षाय) अ० ३।११।३। सहस्रेषु बहुषु कर्मसु अक्षीणि दर्शनशक्तयो यस्य तस्मै (अमर्त्य) हे अमर ॥
