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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भवः) भव [सुख उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर] (दिवः) सूर्य का, (भवः) भव (पृथिव्याः) पृथिवी का (ईशे) राजा है, (भवः) भव ने (उरु) विस्तृत (अन्तरिक्षम्) आकाश को (आ पप्रे) सब ओर से पूरण किया है। (इतः) यहाँ से (यतमस्याम् दिशि) चाहे जौन-सी दिशा हो, उसमें (तस्मै) उस [भव] को (नमः) नमस्कार है ॥२७॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा सब सूर्य आदि लोकों का स्वामी है, उसको हम सब स्थानों में नमस्कार करके अपना ऐश्वर्य बढ़ावें ॥२७॥
टिप्पणी: २७−(भवः) म० ३। सुखोत्पादकः परमेश्वरः (दिवः) सूर्यस्य (ईशे) तलोपः। ईष्टे। राजति (पृथिव्याः) भूमेः (आ) समन्तात् (पप्रे) प्रा पूरणे-लिट्, आत्मनेपदं छान्दसम्। पप्रौ। पूरितवान् (उरु) विस्तृतम् (अन्तरिक्षम्) आकाशम् (तस्मै) (भवाय) परमेश्वराय। अन्यद् गतं पूर्ववच्च-म० १२।१४ ॥
