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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (विष्टभितः) दृढ़ जमा हुआ [परमेश्वर] (अयज्वनः) यज्ञ न करनेवाले [दुर्जन] (देवपीयून्) विद्वानों के हिंसकों को (प्रमृणन्) मारता हुआ (तिष्ठति) ठहरता है। (दशभिः) दस (शक्वरीभिः) शक्तिवाली [दिशाओं] के साथ [वर्तमान] (तस्मै) उस [परमेश्वर] को (नमः) नमस्कार है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा आकाश में और सब दिशा-विदिशाओं में और ऊपर-नीचे व्यापक है, सब मनुष्य उसका आश्रय लेकर दुष्ट विघ्नों और शत्रुओं का नाश करें ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(यः) परमेश्वरः (अन्तरिक्षे) आकाशे (तिष्ठति) वर्तते (विष्टभितः) विविधं स्तभितो दृढीभूतः सन् (अयज्वनः) अ० ३।२४।२। यजेर्ङ्वनिप्। देवपूजारहितान् दुर्जनान् (देवपीयून्) अ० ४।३५।७। विदुषां हिंसकान् (तस्मै) परमेश्वराय (नमः) प्रणामः (शक्वरीभिः) अ० ३।१७।७। शक्लृ शक्तौ-वनिप्, ङीब्रेफौ। उच्चनीचदिग्विदिशाभिः सह वर्तमानायेति शेषः ॥
