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मा नो॑ हिंसी॒रधि॑ नो ब्रूहि॒ परि॑ णो वृङ्ग्धि॒ मा क्रु॑धः। मा त्वया॒ सम॑रामहि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मा । न: । हिंसी: । अधि । न: । ब्रूहि । परि । न: । वृङ्ग्धि । मा । क्रुध: । मा । त्वया । सम् । अरामहि ॥२.२०॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:20


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे रुद्र परमेश्वर !] (नः) हमें (मा हिंसीः) मत कष्ट दे, (नः) हमें (अधि) ईश्वर होकर (ब्रूहि) उपदेश कर, (नः) हमें [पाप से] (परि वृङ्ग्धि) सर्वथा अलग रख, (मा क्रुधः) क्रोध मत कर। (त्वया) तेरे साथ (मा सम् अरामहि) हम समर [युद्ध] न करें ॥˜२०॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा में चलते हैं, वे पुरुषार्थी पुरुष अपराध से बचकर सदा सुखी रहते हैं ॥˜२०॥
टिप्पणी: २०−(नः) अस्मान् (मा हिंसीः) मा वधीः (अधि) ईश्वरत्वेन (नः) अस्मान् (परि) सर्वतः (वृङ्ग्धि) वर्जय। वियोजय (मा क्रुधः) म० १९। (त्वया) (मा सम् अरामहि) म० ७। समरं युद्धं न करवाम ॥˜