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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्राक्षम्) सहस्रों कामों में दृष्टिवाले, (पुरस्तात्) सन्मुख से (अतिपश्यम्) आड़े-बेंड़े देखनेवाले, (बहुधा) अनेक प्रकार से [पापों को] (अस्यन्तम्) गिरानेवाले, (विपश्चितम्) महाबुद्धिमान्, (जिह्वया) जयशक्ति के साथ (ईयमानम्) चलते हुए (रुद्रम्) रुद्र [दुःखनाशक परमेश्वर] से (मा उप अराम) हम विरोध न करें ॥१७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सब व्यवहारों को भली-भाँति देखता हुआ सबको कर्मों का फल यथावत् देता है, हम उसकी आज्ञा का सदा पालन करें ॥१७॥
टिप्पणी: १७−(सहस्राक्षम्) सहस्रेषु कर्मसु दृष्टियुक्तम् (अतिपश्यम्) पाघ्राध्माधेट्दृशः शः। पा० ३।१।१३७। दृशिर् प्रेक्षणे-श प्रत्ययः। पाघ्राध्माधेट्०। पा० ७।३।७८। पश्यादेशः। सर्वानतिक्रम्य द्रष्टा (पुरस्तात्)) अग्रे (रुद्रम्) दुःखनाशकम् (अस्यन्तम्) शत्रुं क्षिपन्तम् (बहुधा) अनेकप्रकारेण (विपश्चितम्) मेधाविनम्। सूक्ष्मदर्शिनम् (मा उप अराम) ऋ गतौ हिंसायां वा माङि लुङि रूपम्। न हिंसेम (जिह्वया) शेवायह्वजिह्वा०। उ० १।१५४। जि जये-वन् हुक् च। जयशक्त्या सह (ईयमानम्) गच्छन्तम्। व्याप्नुवन्तम् ॥
