0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सायम्) सायं काल में (नमः) नमस्कारः (प्रातः) प्रातः काल में (नमः) नमस्कार (रात्र्या) रात्रि में (नमः) नमस्कार (दिवा) दिन में (नमः) नमस्कार। (भवाय) भव [सुख उत्पन्न करनेवाले] (च च) और (शर्वाय) शर्व [दुःख नाश करनेवाले] (उभाभ्याम्) दोनों [गुणों] को (नमः अकरम्) मैंने नमस्कार किया है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य प्रत्येक समय महाशक्तिमान् परमेश्वर का ध्यान करके सदा पराक्रम करता रहे ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(नमः) नमस्कारः (सायम्) सूर्यास्तसमये (प्रातः) प्रभातसमये (रात्र्या) रात्रिसमये (दिवा) दिनकाले (भवाय) म० ३। सुखोत्पादकाय (च च) समुच्चये (शर्वाय) म० ३। दुःखनाशकाय (उभाभ्याम्) द्वाभ्यां गुणाभ्याम् (अकरम्) अहं कृतवानस्मि। अन्यद् गतम् ॥
