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भ॑वारु॒द्रौ स॒युजा॑ संविदा॒नावु॒भावु॒ग्रौ च॑रतो वी॒र्याय। ताभ्यां॒ नमो॑ यत॒मस्यां॑ दि॒शी॒तः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

भवारुद्रौ । सऽयुजा । सम्ऽविदानौ । उभौ । उग्रौ । चरत: । वीर्याय । ताभ्याम् । नम: । यतमस्याम् । दिशि । इत: ॥२.१४॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:14


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सयुजा) समान संयोगवाले, (संविदानौ) समान ज्ञानवाले, (उग्रौ) तेजस्वी (उभौ) दोनों (भवारुद्रौ) भव और रुद्र [सुखोत्पादक और दुःखनाशक गुण] (वीर्याय) वीरता देने को (चरतः) विचरते हैं। (इतः) यहाँ से (यतमस्याम् दिशि) चाहे जौन-सी दिशा हो, उसमें (ताभ्याम्) उन दोनों को (नमः) नमस्कार है ॥१४॥
भावार्थभाषाः - चाहे हम कहीं होवें, परमेश्वर को सर्वज्ञ और सर्वव्यापक जानकर अपना वीरत्व बढ़ावें ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(भवारुद्रौ) म० ३। भवश्च रुद्रश्च तौ। सुखोत्पादकदुःखनाशकौ गुणौ (सयुजा) समानं युञ्जानौ मित्रभूतौ (संविदानौ) समानं जानन्तौ (उभौ) (उग्रौ) तेजस्विनौ (चरतः) विचरतः (वीर्याय) वीरत्वं दातुम् (ताभ्याम्) भवारुद्राभ्याम्। अन्यत् पूर्ववत्-म० १३॥