ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भवाशर्वौ) हे भव और शर्व ! [भव, सुख उत्पन्न करनेवाले और शर्व, शत्रुनाशक परमेश्वर के तुम] [दोनों गुणों] (मृडतम्) प्रसन्न हो, (मा अभियातम्) [हमारे] विरुद्ध मत चलो, (भूतपती) हे सत्ता के पालको ! (पशुपती) हे सब दृष्टिवालों के रक्षको ! (वाम्) तुम दोनों को (नमः) नमस्कार है। (प्रतिहिताम्) लक्ष्य पर लगाई हुई और (आयताम्) तानी हुई [इषु, तीर] को (मा वि स्राष्टम्) तुम दोनों मत छोड़ो, (मा) न (नः) हमारे (द्विपदः) दोपायों और (मा) न (चतुष्पदः) चौपायों को (हिंसिष्टम्) मारो ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे एक ही मनुष्य अपने अधिकारों से गुरुकुल में आचार्य और यज्ञ में ब्रह्मा आदि होता है, वैसे ही एक परमेश्वर अपने गुणों से (भव) सुख उत्पन्न करनेवाला और (शर्व) शत्रुनाशक कहाता है, अर्थात् गुणों के वर्णन से गुणी परमात्मा का ग्रहण है। कहीं (भवाशर्वौ, भवारुद्रौ) द्विवचनान्त और कहीं (भव, शर्व, रुद्र) आदि एकवचनान्त पद हैं। मन्त्र का आशय यह है कि मनुष्य परमेश्वर के गुणों के ज्ञान से सब उपकारी पदार्थों और प्राणियों की रक्षा करके धर्म में प्रवृत्त रहें, जिससे परमेश्वर उस पर क्रुद्ध न होवे ॥१॥इस सूक्त का मिलान अ० ४।२८ से करो ॥