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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शितिपदा) उजाले और अंधेरे में गतिवाली (चतुष्पदी) चारों [धर्म अर्थ काम मोक्ष] में अधिकारवाली (इयम्) यह (शरव्या) बाण-विद्या में चतुर [सेना] (संद्यतु) [शत्रुओं को] काट डाले। (कृत्ये) हे छेदनशील [सेना] ! (त्रिषन्धेः) त्रिसन्धि [म० २। त्रयीकुशल, सेनापति] की (सेनया सह) सेना के साथ (अमित्रेभ्यः) शत्रुओं के मारने को (भव) वर्तमान हो ॥६॥
भावार्थभाषाः - सब वीरसेनाएँ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिये प्रधान सेनापति के आधिपत्य में मिलकर शत्रुओं को जीतें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(शितिपदी) अ० ३।२९।१। कुम्भपदीषु च। पा० ५।४।१३९। पादस्य लोपो ङीप् च। पादः पत्। पा० ६।३।१३०। पदादेशः। शितिः शुक्लः कृष्णश्च तयोर्मध्ये पादो गमनं तस्याः सा तथाभूता। प्रकाशान्धकारमध्यगतिशीला सेना (सम्) सम्यक् (द्यतु) दो अवखण्डने। छिनत्तु (शरव्या) अ० ३।१९।८। तत्र साधुः। पा० ४।४।९८। शरु-यत्। शरौ वाणविद्यायां कुशला (इयम्) (चतुष्पदी) अ० ९।१०।२१। चतुर्वर्गे धर्मार्थकाममोक्षेषु पुरुषार्थेषु पदमधिकारो यस्याः सा (कृत्ये) अ० ४।९।५। ऋदुपधाच्चाक्लृपिचृतेः। पा० ३।१।११०। कृती छेदने-क्यप्। हे छेदनशीले। (अमित्रेभ्यः) क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० २।३।१४। इति चतुर्थी। शत्रून् नाशयितुम् (भव) वर्तस्व (त्रिषन्धेः) म० २। कर्मोपासनाज्ञानेषु कुशलस्य सेनापतेः (सह) (सेनया) ॥
