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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः च) जो कोई (कवची) कवचवाला है, (च) और (यः) जो कोई (अकवचः) बिना कवचवाला है, (च) और (यः) जो (अमित्रः) वैरी (अज्मनि) दौड़-झपट में है। (ज्यापाशैः) धनुषों की डोरी के फन्दों से और (कवचपाशैः) कवचों के फन्दों से (अज्मना) दौड़-झपट के साथ (अभिहतः) मार डाला गया वह [शत्रु] (शयाम्) सोवें ॥२२॥
भावार्थभाषाः - संग्राम के बीच सेनापति दौड़-झपट करके दौड़ते-झपटते शत्रुओं को घेरकर मारे ॥२२॥
टिप्पणी: २२−(यः) (च) (कवची) कवचधारी (यः) (च) (अकवचः) कवचरहितः (अमित्राः) पीडकः शत्रुः (यः) (च) (अज्मनि) अ० ६।९७।३। अज गतिक्षेपणयोः-मनिन्। गमनक्षेपणव्यवहारे। संग्रामे (ज्यापाशैः) मौर्वीपाशैः (कवचपाशैः) वर्मबन्धनपाशैः (अज्मना) गमनक्षेपणव्यापारेण (अभिहतः) विनाशितः (शयाम्) तलोपः। शेताम् ॥
