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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (न्यर्बुदे) हे न्यर्बुदि ! [नित्य पुरुषार्थी राजन्] (अमित्राः) वैरी (मूढाः) घबड़ाये हुए हैं, (एषाम्) इनमें से (वरंवरम्) अच्छे को (जहि) मार। (अनया सेनया) इस सेना से [उन्हें] (जहि) मार ॥२१॥
भावार्थभाषाः - सेनापति अपनी सेना से शत्रुओं को अचेत करके उन के बड़े-बड़े वीरों को मारे ॥२१॥
टिप्पणी: २१−(मूढाः) अचेतसः (अमित्राः) शत्रवः (न्यर्बुदे) म० २०। हे नित्यपुरुषार्थिन् राजन् (जहि) मारय (एषाम्) (वरंवरम्) श्रेष्ठं श्रेष्ठं वीरम् (अनया) स्वकीयया (जहि) (सेनया) ॥
