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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शितिपदी) उजाले और अन्धकार में गतिवाली [सेना] (अमित्राणाम्) वैरियों की (अमूः) उन (सिचः) सींचनेवाली [सहायक सेनाओं] पर (सं पततु) टूट पड़े। (न्यर्बुदे) हे न्यर्बुदि ! [नित्य पुरुषार्थी राजन्] (अद्य) आज (अमित्राणाम्) वैरियों की (अमूः) वे (सेनाः) सेनाएँ (मुह्यन्तु) अचेत हो जावें ॥२०॥
भावार्थभाषाः - चतुर सेनापति शत्रुओं की सहायक सेनाओं को तुरन्त रोककर व्याकुल कर देवे ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(शितिपदी) म० ६। प्रकाशान्धकारमध्यगतिशीला सेना (सं पततु) झटिति प्राप्नोतु (अमित्राणाम्) शत्रूणाम् (अमूः) दृश्यमानाः (सिचः) अ० ११।९।१८। सेचनशीलाः। वर्धयित्रीः सेनाः (मुह्यन्तु) मूढा भवन्तु (अद्य) अस्मिन् दिने (अमूः) (सेनाः) (अमित्राणाम्) (न्यर्बुदे) अ० ११।९।४। हे नित्यपुरुषार्थिन् राजन् ॥
