राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (त्रिषन्धे) हे त्रिसन्धि ! [तीनों कर्म, उपासना और ज्ञान में मेल रखनेवाले, सेनापति] (वः) तुम्हारी (ईशाम्) शासन शक्ति और (राज्यम्) राज्य [राज के विस्तार] को [तुम्हारे] (अरुणैः) रक्त वर्ण [डरावने रूप] वाले (केतुभिः सह) झण्डों के साथ (वेद) मैं [प्रजाजन] जानता हूँ। (ये) जो (मानवाः) ज्ञानियों के बताये हुए (दुर्णामानः) दुर्नामा [दुष्ट नामवाले दोष] (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (ये) जो (दिवि) सूर्य में (च) और (ये) जो (पृथिव्याम्) पृथिवी पर हैं, (ते) वे [सब दोष] (त्रिषन्धेः) [त्रिसन्धि] [त्रयीकुशल विद्वान्] के (चेतसि) चित्त में (उप) हीन होकर (आसताम्) रहें ॥२॥
भावार्थभाषाः - (वः) तुम्हारी−आदरार्थ बहुवचन है। प्रजागण त्रिसन्धि अर्थात् अपने कर्तव्य, ईश्वरभक्ति और यथार्थ ज्ञान में प्रीतिवाले राजा का आदर-सत्कार करें। वह दूरदर्शी पुरुष आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक विपत्तियों से आप बचे और सबको बचावे ॥२॥