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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (उदाराः) हे उदार पुरुषो ! [बड़े अनुभवी लोगो] (उत् तिष्ठत) उठो और (केतुभिः सह) झण्डों के साथ (संनह्यध्वम्) कवचों को पहिनों [जो] (सर्पाः) सर्प [सर्पों के समान] हिंसक (इतरजनाः) पामर जन (रक्षांसि) राक्षस हैं, (अमित्रान् अनु) [उन] शत्रुओं पर (धावत) धावा करो ॥१॥
भावार्थभाषाः - महानुभवी शूर वीर पुरुष कवच आदि पहिनकर और ध्वजा पताका अस्त्र-शस्त्र लेकर शत्रुओं पर चढ़ें ॥१॥
टिप्पणी: १−(उत् तिष्ठत) उद्गच्छत (संनह्यध्वम्) सन्नाहान् धरत (उदाराः) महान्तः। महानुभविनः (केतुभिः) ध्वजैः (सह) (सर्पाः) सर्पतुल्यहिंसकाः (इतरजनाः) पामरपुरुषाः (रक्षांसि) राक्षसाः (अमित्रान्) शत्रून् (अनु) प्रति (धावत) शीघ्रं गच्छत ॥
