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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इयम्) यह (मही) बड़ी (देवी) श्रेष्ठगुणवाली, (सुमनस्यमाना) प्रसन्न मनवाली [प्रजा] (पृथिवी) पृथिवी पर (चर्म) विज्ञान (प्रति गृह्णातु) ग्रहण करे। (अथ) फिर (सुकृतस्य) धर्म के (लोकम्) समाज में (गच्छेम) हम जावें ॥८॥
भावार्थभाषाः - प्रशस्त विज्ञानी लोग धर्मात्माओं के समाज में प्रतिष्ठा पाकर आनन्दयुक्त होवें ॥८॥इस मन्त्र का उत्तरभाग आ चुका है-अथर्व० ६।१२१।१। और ७।८३।४ ॥
टिप्पणी: ८−(इयम्) उपस्थिता (मही) महती (प्रतिगृह्णातु) स्वीकरोतु (चर्म) सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। चर गतिभक्षणयोः मनिन्। विज्ञानम्-दयानन्दभाष्ये, यजु० ३०।१५। (पृथिवी) विभक्तेः सु। पृथिव्याम् (देवी) उत्तमगुणा (सुमनस्यमाना) भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च हलः। पा० ३।१।१२। सुमनस्-क्यङ्, शानच्। शुभचिन्तिका (अथ) अनन्तरम् (गच्छेम) प्राप्नुयाम (सुकृतस्य) पुण्यस्य (लोकम्) समाजम् ॥
