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वृ॑ष॒भोसि॑ स्व॒र्ग ऋषी॑नार्षे॒यान्ग॑च्छ। सु॒कृतां॑ लो॒के सी॑द॒ तत्र॑ नौ संस्कृ॒तम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृषभ: । असि । स्व:ऽग: । ऋषीन् । आर्षेयान् । गच्छ । सुऽकृताम् । लोके । सीद । तत्र । नौ । संस्कृतम् ॥१.३५॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:35


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] तू (वृषभः) महाबली और (स्वर्गः) सुख पहुँचानेवाला (असि) है, (ऋषीन्) ऋषियों [सूक्ष्मदर्शियों] को और (आर्षेयान्) ऋषियों में विख्यात पुरुषों को (गच्छ) प्राप्त हो। (सुकृताम्) सुकर्मियों के (लोके) समाज में (सीद) बैठ, (तत्र) वहाँ (नौ) हम दोनों का (संस्कृतम्) संस्कार होवे [अर्थात् मैं तेरी उपासना करूँ और तू मुझे बल देवे] ॥३५॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य जगदीश्वर की उपासना करके पुण्यात्माओं के समान व्यवहार करते हैं, वे बली और सुखी होते हैं ॥३५॥
टिप्पणी: ३५−(वृषभः) अ० ४।५।१। वृषु प्रजनैश्ययोः-अभच्, कित्। महाबली (असि) (स्वर्गः) सुखस्य गमयिता (ऋषीन्) सूक्ष्मदर्शिनः पुरुषान् (आर्षेयान्) म० १३। ऋषिषु विख्यातान् (गच्छ) प्राप्नुहि (सुकृताम्) सुकर्मिणाम् (लोके) समाजे (सीद) तिष्ठ (तत्र) समाजे (नौ) आवयोः। मम च तव च (संस्कृतम्) संस्कारः ॥