ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भूतकृतः) उचित कर्म करनेवाले (सप्तऋषयः) सात ऋषियों [व्यापनशील वा दर्शनशील, अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि] ने (अदितेः) अदिति [अखण्ड व्रतवाली प्रजा] के (याम्) जिस (हस्ताम्) खिली हुई [एताम्] इस (द्वितीयाम्) दूसरी [शारीरिक से भिन्न मानसिक] (स्रुचम्) स्रुचा [डोई अर्थात् चित्तवृत्ति] को (अकृण्वन्) बनाया है, (ओदनस्य) ओदन [सुख की वर्षा करनेवाले अन्नरूप परमात्मा] के (गात्राणि) अङ्गों [गुणों के तत्त्वों] को (विदुषी) जानती हुई (सा) वह (दर्विः) करछी [चित्तवृत्ति] (वेद्याम्) वेदी पर [हृदय में] (एनम्) इस [अन्नरूप परमात्मा] को (अधि) अधिक-अधिक (चिनोतु) एकत्र करे ॥२४॥
भावार्थभाषाः - इन्द्रियों द्वारा विषयों के ज्ञान से बाहिरी और भीतरी दो वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। बाहिरी वृत्ति भीतरी वृत्ति के आधीन है। योगी को उचित है कि भीतरी वृत्तियों को परमात्मा के गुणों में लगाकर उस जगदीश्वर को अपने हृदय में बैठावे, जैसे वेदी पर चढ़ी बटलोही के घृत आदि को करछी से संभाल-संभाल कर उपकारी बनाते हैं ॥२४॥