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उ॒देहि॒ वेदिं॑ प्र॒जया॑ वर्धयैनां नु॒दस्व॒ रक्षः॑ प्रत॒रं धे॑ह्येनाम्। श्रि॒या स॑मा॒नानति॒ सर्वा॑न्त्स्यामाधस्प॒दं द्वि॑ष॒तस्पा॑दयामि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत्ऽएहि । वेदिम् । प्रऽजया । वर्धय । एनाम् । नुदस्व । रक्ष: । प्रऽतरम् । धेहि । एनाम् । श्रिया । समानान् । अति । सर्वान् । स्याम । अध:ऽपदम् । द्विषत: । पादयामि ॥१.२१॥

अथर्ववेद » काण्ड:11» सूक्त:1» पर्यायः:0» मन्त्र:21


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] (वेदिम्) वेदी पर [यज्ञभूमिरूप हृदय में] (उदेहि) उदय हो (प्रजया) सन्तान के साथ (एनाम्) इस [प्रजा अर्थात् मुझ] को (वर्धय) बढ़ा, (रक्षः) राक्षस [विघ्न] को (नुदस्व) हटा, (एनाम्) इस [प्रजा अर्थात् मुझ] को (प्रतरम्) अधिक उत्तमता से (धेहि) पुष्ट कर। (सर्वान्) सब (समानान्) समानों [तुल्य गुणवालों] से (श्रिया) लक्ष्मीद्वारा (अति स्याम) हम बढ़ जावें, (द्विषतः) शत्रुओं को (अधस्पदम्) पैरों के तले (पादयामि) मैं गिरा दूँ ॥२१॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्मा को अपने हृदय में विद्यमान जानते हैं, वे अपने सन्तानों सहित उन्नति करके विघ्नों को हटाकर सुख पाते हैं ॥२१॥इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध-म० १२ में आ चुका है ॥
टिप्पणी: २१−(उदेहि) उदागच्छ (वेदिम्) अ० ५।२२।१। यज्ञभूमिम् (प्रजया) सन्तानेन सह (वर्धय) समर्धय (एनाम्) प्रजाम्, मामित्यर्थः (नुदस्व) प्रेरय (रक्षः) यज्ञविघातकं विघ्नम् (धेहि) पोषय (एनाम्) अन्यत् पूर्ववत्-म० १३ ॥