ब्रह्मज्ञान से उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शुद्धाः) शुद्धस्वभाववाली, (पूताः) पवित्र आचरणवाली, (यज्ञियाः) पूजनीय (योषितः) सेवायोग्य, (शुभ्राः) चरित्रवाली (इमाः) यह (आपः) विद्या में व्याप्त स्त्रियाँ (चरुम्) ज्ञान को (अव) निश्चय करके (सर्पन्तु) प्राप्त हों। इन [शिक्षित स्त्रियों] ने (नः) हमें (प्रजाम्) सन्तान और (बहुलान्) बहुविध (पशून्) [गौ भैंस आदि] पशु (अदुः) दिये हैं, (ओदनस्य) सुख बरसानेवाले [वा मेघरूप परमेश्वर] का (पक्ता) पक्का [मन में दृढ़] करनेवाला मनुष्य (सुकृताम्) सुकर्मियों के (लोकम्) समाज को (एतु) पहुँचे ॥१७॥
भावार्थभाषाः - गुणवती स्त्रियों के शुभ प्रबन्ध से उत्तम सन्तान और उत्तम गौ, भैंस, बकरी आदि उपकारी पशु घर में होते हैं और परमेश्वर की आज्ञा पालनेवाला पुरुष अवश्य प्रतिष्ठा पाता है ॥१७॥इस मन्त्र का पहिला पाद आ चुका है-अ० ६।१२२।५ ॥