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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वेदवाणी की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शतौदने) हे सैकड़ों प्रकार सींचनेवाली ! और (अघ्न्ये) हे न मारनेवाली ! [वेदवाणी] (यत्) जो (ते) तेरा (चर्म) चर्म और (यानि) जो (लोमानि) लोम हैं, वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा [पकाये उष्ण दूध में दही मिलाने से उत्पन्न वस्तु], (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी (अथो) और भी (मधु) मधुज्ञान [ब्रह्मविद्या] (दात्रे) दाता को (दुह्रताम्) भरपूर करें ॥२४॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १३ के समान है ॥२४॥
टिप्पणी: २४−(शतौदने) म० १। हे बहुप्रकारसेचनशीले (अघ्न्ये) म० ३। हे अहिंसिके वेदवाणि। अन्यद् गतम्−म० १३ स्पष्टं च ॥
