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यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॑र्म॒णिं फालं॑ घृत॒श्चुत॑मु॒ग्रं ख॑दि॒रमोज॑से। तं सोमः॒ प्रत्य॑मुञ्चत म॒हे श्रोत्रा॑य॒ चक्ष॑से। सो अ॑स्मै॒ वर्च॒ इद्दु॑हे॒ भूयो॑भूयः॒ श्वःश्व॒स्तेन॒ त्वं द्वि॑ष॒तो ज॑हि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यम् । अबध्नात् । बृहस्पति: । मणिम् । फालम् । घृतऽश्चुतम् । उग्रम् । खदिरम् । ओजसे । तम् । सोम: । प्रति । अमुञ्चत । महे । श्रोत्राय । चक्षसे । स: । अस्मै । वर्च: । इत् । दुहे । भूय:ऽभूय:। श्व:ऽश्व: । तेन । त्वम् । द्विषत: । जहि ॥६.८॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:8


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब कामनाओं की सिद्धि का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी परमेश्वर] ने (यम्) जिस.... म० ६। (तम्) उस [वैदिक नियम] को (सोमः) सोम [सोमरस, अन्न आदि अमृतसमान सुख उत्पन्न करनेवाले पुरुष] ने (महे) महत्त्व के लिये, (श्रोत्राय) श्रवण सामर्थ्य के लिये और (चक्षसे) दर्शन सामर्थ्य के लिये (प्रति अमुञ्चत) स्वीकार किया है। (सः) वह [वैदिक नियम] (अस्मै) इस [पुरुष] के लिये (इत्) ही (वर्चः) तेज (भूयोभूयः) बहुत-बहुत.... म० ६ ॥८॥
भावार्थभाषाः - जिस परमेश्वर के नियम से अन्न आदि अमृत पदार्थ शरीर को पुष्ट कर इन्द्रियों को स्वस्थ रखते हैं, उसी परमात्मा के ज्ञान से पूर्वजों के समान दूरदर्शी होकर सब लोग सुखवृद्धि करें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(सोमः) सोमरसः। अन्नाद्यमृतपदार्थः (महे) मह पूजायाम्-क्विप् महत्त्वाय (श्रोत्राय) श्रवणसामर्थ्याय (चक्षसे) दर्शनसामर्थ्याय (वर्चः) तेजः। अन्यत् पूर्ववत् ॥