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यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॑र्दे॒वेभ्यो॒ असु॑रक्षितिम्। स मा॒यं म॒णिराग॑म॒त्सर्वा॑भि॒र्भूति॑भिः स॒ह ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यम् । अबध्नात् । बृहस्पति: । देवेभ्य: । असुरऽक्षितिम् । स: । मा । अयम् । मणि: । आ । अगमत् । सर्वाभि: । भूति:ऽभि: । सह ॥६.२८॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:28


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब कामनाओं की सिद्धि का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) जिस (असुरक्षितिम्) असुरनाशक [वैदिक नियम] को (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी परमेश्वर] ने (देवेभ्यः) विजयी लोगों के लिये (अबध्नात्) बाँधा है, (यः अयम्) वही (मणिः) मणि [प्रशंसनीय वैदिक नियम] (मा) मुझे (सर्वाभिः) सब प्रकार की (भूतिभिः सह) सम्पत्तियों सहित (आ अगमत्) प्राप्त हुआ है ॥२८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा के नियम पर चलकर सब प्रकार की सम्पत्तियाँ प्राप्त करें ॥२८॥
टिप्पणी: २८−(भूतिभिः) विभूतिभिः। सम्पत्तिभिः। सिद्धिभिः। अन्यत् पूर्ववत् ॥