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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इह) यहाँ पर (अहयः) महाहिंसक [साँप] (अरसासः) नीरस हों, (ये) जो (अन्ति) पास (च) और (ये) जो (दूरके) दूर हैं। (आगतम्) आये हुए (वृश्चिकम्) डङ्क मारनेवाले बिच्छू और (अहिम्) महाहिंसक [साँप] को (घनेन) सोटें वा मोंगरे से और (दण्डेन) दण्डे से (हन्मि) मैं मारता हूँ ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य साँप रूप दुःखदायिओं को यथावत् दण्ड देवें ॥९॥
टिप्पणी: ९−(अरसासः) अरसाः। सारहीनाः (इह) अत्र (अहयः) म० १। महाहिंसकाः। सर्पाः (ये) (अन्ति) पार्श्वे (ये) (च) (दूरके) दूरे (घनेन) काष्ठस्य लोहस्य वा मुद्गरेण (हन्मि) (वृश्चिकम्) वृश्चिकृषोः किकन्। उ० २।४०। ओव्रश्चू छेदने-किकन्। छेदनशीलम्। कीटभेदम् (अहिम्) (दण्डेन) ञमन्ताड् डः। उ० १।११४। दमु-उपशमे−ड, यद्वा दण्ड दण्डपातने-अच्। दमनसाधनेन लगुडेन (आगतम्) ॥
