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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पैद्व) हे शीघ्रगामी [पुरुष !] (प्रथमः) आगे होकर (प्र इहि) बढ़ा चल, (त्वा अनु) तेरे पीछे-पीछे (वयम्) हम (आ ईमसि) आते हैं। (अहीन्) महाहिंसक [साँपों] को (पथः) उस मार्ग से (वि अस्यतात्) मार गिरा (येन) जिस से (वयम्) हम (स्म) ही (आ-ईमसि) आते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - अग्रगामी शूर को शत्रुओं के नाश करने में सब लोग सहाय करें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(पैद्वः) म० ५। हे शीघ्रगामिन् (प्र इहि) अग्रे गच्छ (प्रथमः) प्रधानः (अनु) अनुसृत्य (त्वा) (वयम्) (आ-ईमसि) ई गतौ-लट्, मसो मसि। ईमः। आगच्छामः (अहीन्) म० १। महाहिंसकान्। सर्पान् (वि) विशेषेण (अस्यतात्) अस्य। क्षिप (पथः) मार्गात् (येन) यथा (स्म) अवधारणे (वयम्, आ ईमसि) ॥
