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अ॑रंघु॒षो नि॒मज्यो॒न्मज॒ पुन॑रब्रवीत्। उ॑दप्लु॒तमि॑व॒ दार्वही॑नामर॒सं वि॒षं वारु॒ग्रम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अरम्ऽघुष: । निऽमज्य । उत्ऽमज्य । पुन: । अब्रवीत् । उदप्लुतम्ऽइव । दारु । अहीनाम् । अरसम् । विषम् । वा: । उग्रम् ॥४.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:4


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अरंघुषः) पूरी घोषणा करनेवाले [पुरुष] ने (निमज्य) डुबकी लगाकर और (उन्मज्य) उछल कर (पुनः) फिर (अब्रवीत्) कहा।(उदप्लुतम्) जल में बही हुई (दारु इव) लकड़ी के समान (अहीनाम्) सर्पों का (उग्रम्) क्रूर (वाः) जल [अर्थात्] (विषम्) विष (अरसम्) नीरस [होवे] ॥४॥
भावार्थभाषाः - विवेकी जन घोषणा देकर विचारपूर्वक शत्रुओं को ऐसा निर्बल करे, जैसे वैद्य द्वारा विष जल में बही लकड़ी के समान निकम्मा हो जाता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(अरंघुषः) अलम्+घुषिर् अविशब्दने-क, लस्य रः। पर्याप्तघोषणाकारी (निमज्य) जले प्रविश्य यथा (उन्मज्य) जलादुद्गत्य यथा (पुनः) (अब्रवीत्)। अन्यत् पूर्ववत्−म० ३ ॥