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अव॑ श्वेत प॒दा ज॑हि॒ पूर्वे॑ण॒ चाप॑रेण च। उ॑दप्लु॒तमि॑व॒ दार्वही॑नामर॒सं वि॒षं वारु॒ग्रम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अव । श्वेत । पदा । जहि । पूर्वेण । च । अपरेण । च । उदप्लुतम्ऽइव । दारु । अहीनाम् । अरसम् । विषम् । वा: । उग्रम् ॥४.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सर्प रूप दोषों के नाश का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (श्वेत) हे प्रवृद्ध [मनुष्य !] तू (पूर्वेण) अगले (च च) और (अपरेण) पिछले (पदा) पाद [पैर की चोट] से (अव जहि) मार डाल। (उदप्लुतम्) जल में बही हुई (दारु इव) लकड़ी के समान (अहीनाम्) सर्पों का (उग्रम्) क्रूर (वाः) जल [अर्थात्] (विषम्) विष (अरसम्) नीरस होवे ॥३॥
भावार्थभाषाः - राजा के प्रबन्ध से दुष्ट लोग ऐसे निर्बल हो जावें, जैसे उत्तम वैद्य के प्रयत्न से विष निकम्मा हो जाता है, जैसे लकड़ी जल में बहती-बहती गलकर सारहीन हो जाती है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(श्वेत) हसिमृग्रिण्० उ० ३।८६। टुओश्वि गतिवृद्ध्योः-तन्। हे प्रवृद्ध। मनुष्य (पदा) पादेन (अव जहि) विनाशय (पूर्वेण) अग्रभागेन (च) (अपरेण) पश्चाद् भागेन (उदप्लुतम्) जले सृप्तम् (इव) (दारु) काष्ठम् (अहीनाम्) म० १। सर्पाणाम् (अरसम्) सारहीनम् (विषम्) गरलम् (वाः) जलम् (उग्रम्) क्रूरम् ॥