वांछित मन्त्र चुनें

प्रैणा॑ञ्छृणीहि॒ प्र मृ॒णा र॑भस्व म॒णिस्ते॑ अस्तु पुरए॒ता पु॒रस्ता॑त्। अवा॑रयन्त वर॒णेन॑ दे॒वा अ॑भ्याचा॒रमसु॑राणां॒ श्वः श्वः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । एनान् । शृणीहि । प्र । मृण । आ । रभस्व । मणि: । ते । अस्तु । पुर:ऽएता । पुरस्तात् । अवारयन्त । वरणेन । देवा: । अभिऽआचारम् । असुराणाम् । श्व:ऽश्व: ॥३.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:2


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (एनान्) इनको (प्रशृणीहि) कुचल डाल, (प्रमृण) मार डाल, (आ रभस्व) पकड़ ले, (मणिः) प्रशंसनीय [वैदिक बोध] (ते) तेरा (पुर एता) अगुआ (पुरस्तात्) सामने (अस्तु) होवे। (देवाः) देवताओं [विजयी लोगों] ने (वरणेन) वरण [श्रेष्ठ वैदिक बोध वा वरना औषध] से (असुराणाम्) सुरविरोधी [दुष्टों] के (अभ्याचारम्) विरुद्ध आचरण को (श्वः श्वः) एक आगामी कल से दूसरी कल को (अर्थात् पहिले से ही) (अवारयन्त) रोका था ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे दूरदर्शी पूर्वज महात्माओं ने उत्तम ज्ञानों और उत्तम औषधों द्वारा आत्मिक और शारीरिक रोग मिटाये हैं, वैसे ही सब मनुष्य उत्तम गुणों और उत्तम ओषधियों के सेवन से उन्नति करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(प्र) प्रकर्षेण (एनान्) शत्रून् (शृणीहि) नाशय (प्र) (मृण) (आरभस्व) (मणिः) (ते) तव (अस्तु) (पुर एता) अग्रगामी (पुरस्तात्) अग्रे (अवारयन्त) निवारितवन्तः (वरणेन) म० १। स्वीकरणीयेन। वैदिकबोधेन। वरुणौषधेन (देवाः) विजिगीषवः (अभ्याचारम्) विरुद्धाचरणम् (असुराणाम्) सुरविरोधिनाम् (श्वः श्वः) आगामिन्यागामिनि दिवसे। पूर्वविचारेणेत्यर्थः ॥