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अ॒यं मे॑ वर॒ण उर॑सि॒ राजा॑ दे॒वो वन॒स्पतिः॑। स मे॒ शत्रू॒न्वि बा॑धता॒मिन्द्रो॒ दस्यू॑नि॒वासु॑रान् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अयम् । मे । वरण: । उरसि । राजा । देव: । वनस्पति: । स: । मे । शत्रून् । वि । बाधताम् । इन्द्र: । दस्यून्ऽइव । असुरान् ॥३.११॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:3» पर्यायः:0» मन्त्र:11


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सब सम्पत्तियों के पाने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (राजा) राजा, (देवः) दिव्य गुणवाला (वनस्पतिः) सेवनीय गुणों का रक्षक (वरणः) वरण [स्वीकार करने योग्य वैदिक बोध वा वरना औषध] (मे) मेरे (उरसि) हृदय में है। (सः) वह (मे) मेरे (शत्रून्) शत्रुओं को (वि बाधताम्) हटा देवे, (इव) जैसे (इन्द्रः) इन्द्र [बड़ा ऐश्वर्यवान् पुरुष] (असुरान्) सज्जनों के विरोधी (दस्यून्) डाकुओं को [हटाता है] ॥११॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् मनुष्य परमात्मा में श्रद्धा करके आत्मा और शरीर की उन्नति करता हुआ प्रतापी शूरों के समान शत्रुओं का नाश करे ॥११॥
टिप्पणी: ११−(उरसि) हृदये (राजा) ऐश्वर्यवान् (शत्रून्) अरीन् (वि) विशेषेण (बाधताम्) निवारयतु (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (दस्यून्) चौरान् महासाहसिकान् (इव) यथा (असुरान्) सज्जनविरोधकान् ॥