0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) उस [मनुष्य] को (न वै) न कभी (चक्षुः) दृष्टि और (न) न (प्राणः) प्राण [जीवनसामर्थ्य] (जरसः पुरा) [पुरुषार्थ के] घटाव से पहिले (जहाति) तजता है, (यः) जो मनुष्य (ब्रह्मणः) ब्रह्म [परमात्मा] की (पुरम्) [उस] पूर्ति को (वेद) जानता है, (यस्याः) जिस [पूर्ति] से वह [परमेश्वर] (पुरुषः) पुरुष [परिपूर्ण] (उच्यते) कहा जाता है ॥३०॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य पूर्ण परमात्मा को जानता है, उस मनुष्य में दिव्यदृष्टि और आत्मबल सदा बना रहता है, जब तक वह पुरुषार्थ करता रहता है ॥३०॥
टिप्पणी: ३०−(न) निषेधे (वै) एव (तम्) मनुष्यम् (चक्षुः) दृष्टिः (जहाति) त्यजति (न) (प्राणः) (जरसः) जरायाः। पुरुषार्थहानेः सकाशात् (पुरा) पूर्वम्। अन्यत् पूर्ववत्−मन्त्रे २८ ॥
