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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत् वै) वही (शिरः) शिर (अथर्वणः) निश्चल परमात्मा के (देवकोशः) उत्तम गुणों का भण्डार [भाण्डागार] (समुब्जितः) ठीक-ठीक बना है। (तत्) उस (शिरः) शिर की (प्राणः) प्राण [जीवन वायु] (अभि) सब ओर से (रक्षति) रक्षा करता है, (अन्नम्) अन्न (अथो) और (मनः) मन [रक्षा करता है] ॥२७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य शिर के भीतर ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगाकर परमात्मा की सत्ता का सूक्ष्म विचार करता है। वह शिर प्राण, अन्न और मन द्वारा रक्षित रहता है ॥२७॥
टिप्पणी: २७−(तत्) (वै) एव (अथर्वणः) म० २६। निश्चलपरमेश्वरस्य (शिरः) मस्तकम् (देवकोशः) कुश श्लेषे-घञ्। दिव्यगुणानां भाण्डागारः (समुब्जितः) सम्यक् सरलीकृतः (तत्) प्राणः जीवनवायुः (अभि) सर्वतः (रक्षति) पाति (शिरः) (अन्नम्) (अथो) अपि च (मनः) ॥
