ब्रह्म॑ दे॒वाँ अनु॑ क्षियति॒ ब्रह्म॒ दैव॑जनी॒र्विशः॑। ब्रह्मे॒दम॒न्यन्नक्ष॑त्रं॒ ब्रह्म॒ सत्क्ष॒त्रमु॑च्यते ॥
पद पाठ
ब्रह्म । देवान् । अनु । क्षियति । ब्रह्म । दैवऽजनी: । विश: । ब्रह्म । इदम् । अन्यत् । नक्षत्रम् । ब्रह्म । सत् । क्षत्रम् । उच्यते ॥२.२३॥
अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:23
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [मनुष्य] (ब्रह्म=ब्रह्मणा) ब्रह्म [परमेश्वर] द्वारा (देवान्) स्तुतियोग्य गुणों, और (ब्रह्म) ब्रह्म द्वारा (दैवजनीः) दैव [पूर्वजन्म के अर्जित कर्म] से उत्पन्न (विशः अनु) मनुष्यों में (क्षियति) रहता है। (ब्रह्म) ब्रह्म द्वारा (इदम्) यह (सत्) सत्य (क्षत्रम्) राज्य और (ब्रह्म) ब्रह्म द्वारा (अन्यत्) दूसरा [भिन्न] (नक्षत्रम्) अराज्य (उच्यते) बताया जाता है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - यह मन्त्र का उत्तर है। मनुष्य परमेश्वर से वेद द्वारा उत्तम गुणों उत्तम लोगों को पावे और वेद द्वारा ही धर्म्म राज्य की विधि और अधर्म्म कुराज्य का निषेध सीखे ॥२३॥
टिप्पणी: २३−(ब्रह्म) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। विभक्तेः सुः। ब्रह्मणा। परमेश्वरद्वारा। अन्यत् पूर्ववत्−मन्त्र २२ ॥
