0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [मनुष्य] (केन) किस के द्वारा (देवान्) स्तुतियोग्य गुणों, और (केन) किस के द्वारा (दैवजनीः) दैव [पूर्वजन्म के अर्जित कर्म] से उत्पन्न (विशः अनु) मनुष्यों में (क्षियति) रहता है। (केन) किस के द्वारा (इदम्) यह (सत्) सत्य (क्षत्रम्) राज्य, और (केन) किसके द्वारा (अन्यत्) दूसरा [भिन्न] (नक्षत्रम्) अराज्य (उच्यते) बताया जाता है ॥२२॥
भावार्थभाषाः - विचारशील मनुष्य उत्तम गुणों और उत्तम लोगों से मिलने, धर्मयुक्त राज्य की विधि और अधर्मयुक्त कुराज्य के निषेध पर विचार करे। इस का उत्तर आगामी मन्त्र में है ॥२२॥
टिप्पणी: २२−(केन) केन द्वारा (देवान्) दिव्यगुणान् (अनु) अनुलक्ष्य (क्षियति) निवसति (केन) (दैवजनीः) देवाद् यञञौ। वा० पा० ४।१।८५। देव-अञ्। दैवात् पूर्वजन्मार्जितकर्मणो जाताः (विशः) प्रजाः। मनुष्यान्-निघ० २।३ (केन) (इदम्) प्रत्यक्षम् (अन्यत्) भिन्नम् (नक्षत्रम्) नभ्राण्नपान्नवेदानासत्या०। पा० ६।३।७५। इति नञः प्रकृतिभावः, नक्षत्रम् अक्षत्रम् अराज्यं कुराज्यम् (केन) (सत्) सत्यम्। धर्म्यम् (क्षत्रम्) राज्यम् (उच्यते) कथ्यते ॥
