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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुषः) मनुष्य (केन) किसके द्वारा (श्रोत्रियम्) वेदज्ञानी [आचार्य] को, (केन) किसके द्वारा (इमम्) इस (परमेष्ठिनम्) सब से ऊँचे ठहरनेवाले [परमेश्वर] को (आप्नोति) पाता है। उसने (केन) किसके द्वारा (इमम्) इस (अग्निम्) अग्नि [सूर्य, बिजुली और पार्थिव अग्नि] को, (केन) किसके द्वारा (संवत्सरम्) संवत्सर [अर्थात् काल] को (ममे) मापा है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विचारता रहे कि वह किस प्रकार से आचार्य और परमेश्वर की आज्ञा पूरण कर सकता है और सूर्य आदि पदार्थों से कैसे उपकार ले सकता है। इसका उत्तर आगामी मन्त्र में है ॥२०॥
टिप्पणी: २०−(केन) केन द्वारा (श्रोत्रियम्) अ० ९।६(३)।७। वेदज्ञमाचार्य्यम् (आप्नोति) प्राप्नोति (केन) (परमेष्ठिनम्) अ० १।७।२। उत्तमपदस्थं परमात्मानम् (केन) (इमम्) (अग्निम्) सूर्यविद्युत्पार्थिवाग्निरूपम् (पुरुषः) मनुष्यः (केन) (संवत्सरम्) कालमित्यर्थः (ममे) माङ् माने-लिट्। मापितवान्। वशीकृतवान् ॥
